नई दिल्ली : उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 के कथित तौर पर बड़ी संख्या में जमा किए जाने और उनमें गड़बड़ियों के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से इन शिकायतों के तथ्यों की जांच करने और जरूरी सुधारात्मक कदम उठाने को कहा। अदालत ने याचिकाकर्ता को उन विसंगतियों का विवरण तैयार कर चुनाव आयोग को सौंपने का निर्देश भी दिया।
यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष आया। पीठ कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू अदालत में पेश हुए।
सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे उन गड़बड़ियों की पहचान करते हुए एक विस्तृत नोट तैयार करें, जिनका समाधान अब तक नहीं हुआ है। इस नोट को चुनाव आयोग के वरिष्ठ वकील को सौंपा जाए, ताकि शिकायतों के तथ्यों की जांच की जा सके।
अदालत ने कहा कि नोट मिलने के बाद निर्वाचन आयोग आरोपों के तथ्यात्मक पहलुओं की पड़ताल करे। यदि आवश्यक हो तो उचित सुधारात्मक कार्रवाई की जाए और इस संबंध में अनुपालन रिपोर्ट भी दाखिल की जाए।
फॉर्म-7 के जरिए नाम हटाने को लेकर विवाद
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि अगस्त में अदालत ने चुनाव आयोग से बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के पास फॉर्म-7 जमा किए जाने से संबंधित अंतरिम आवेदन पर जवाब देने को कहा था। वकील ने बताया कि उस समय छत्तीसगढ़, केरल और उत्तर प्रदेश से जुड़े मामले अदालत के सामने थे।
उनके अनुसार, छत्तीसगढ़ और केरल से संबंधित मुद्दों का समाधान हो चुका है, जबकि फॉर्म-7 में कथित गड़बड़ियों का मामला अब उत्तर प्रदेश से जुड़ा हुआ है। फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज नाम को हटाने के लिए आपत्ति दर्ज कराने के उद्देश्य से किया जाता है। ऐसे में इसके दुरुपयोग की शिकायतें मतदाता सूची की निष्पक्षता और पारदर्शिता से जुड़े सवाल खड़े करती हैं।
एक ही समुदाय के लोगों को लेकर दर्ज हुए आवेदन
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में दावा किया कि एक निर्वाचन क्षेत्र में 32 फॉर्म जमा किए गए थे और सभी एक ही विशेष समुदाय के लोगों से संबंधित थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दो फॉर्म पर बूथ लेवल ऑफिसर के हस्ताक्षर थे।
वकील ने चुनाव आयोग के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि मामले में कई विसंगतियां हैं और इनकी गंभीरता से जांच की जरूरत है। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में उचित कार्रवाई नहीं होने के कारण ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, ये आरोप याचिकाकर्ता की ओर से रखी गई दलीलों का हिस्सा हैं। मामले में संबंधित तथ्यों की जांच चुनाव आयोग द्वारा की जानी है।
निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में फॉर्म-7 आवेदन जमा किए जाने की जानकारी मिलने पर आयोग के अधिकारियों ने मौके पर जाकर उनका सत्यापन किया था।
उन्होंने कहा कि जांच में आवेदन झूठे पाए गए और उनके आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाने की कोई कार्रवाई नहीं की गई। नायडू ने यह भी कहा कि शिकायत दर्ज होने के बाद आयोग संबंधित दावों की जांच कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में शिकायतों का विवरण आयोग को सौंपने और उनके तथ्यों की जांच करने की प्रक्रिया अपनाने को कहा है।
केरल में SIR की समयसीमा बढ़ाने से इनकार
इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केरल में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया की समयसीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि मतदाता सूची में सुधार कराने और नए नाम शामिल कराने के अनुरोध लगातार चलने वाली प्रक्रिया के तहत किए जा सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में फॉर्म-7 से जुड़ी शिकायतों पर अदालत के निर्देश को मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब चुनाव आयोग को याचिकाकर्ता की ओर से दिए जाने वाले विवरण की जांच कर आवश्यक कार्रवाई और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।

