सहारनपुर : सहारनपुर के गांव झबीरण में बुधवार की सुबह का माहौल कुछ अलग था। घर-आंगन में खुशी थी, मोबाइल फोन लगातार बज रहे थे और हर कोई एक ही खबर सुनना चाहता था—प्राची ने गोल्ड जीत लिया। जापान के आइची प्रांत में चल रहे एशियन गेम्स 2026 में भारतीय महिला टीम ने 4×400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक जीता। इस टीम का हिस्सा रहीं सहारनपुर की बेटी प्राची चौधरी ने तीन साल पहले अपनी मां से किया वादा पूरा कर दिया।

प्राची के लिए यह सिर्फ एक स्वर्ण पदक नहीं है। इसके पीछे गांव की कच्ची चकरोड़ पर शुरू हुई दौड़, किसान पिता की मेहनत, परिवार का संघर्ष और हांगझोऊ एशियन गेम्स के बाद मां की दी गई वह सीख है, जिसने उनके लक्ष्य को और मजबूत कर दिया।
हांगझोऊ के रजत से जापान के स्वर्ण तक
वर्ष 2023 में चीन के हांगझोऊ में हुए एशियन गेम्स में भारतीय महिला टीम ने 4×400 मीटर रिले में रजत पदक जीता था। टीम ने 3 मिनट 27.85 सेकंड का समय निकाला था। टीम में प्राची के साथ विथ्या रामराज, ऐश्वर्या मिश्रा और सुभा वेंकटेशन शामिल थीं।
रजत पदक जीतकर प्राची जब घर लौटीं तो परिवार खुश था, लेकिन मां राजेश ने बेटी से कहा कि अभी और मेहनत करनी है। अगर स्वर्ण चाहिए तो तैयारी पहले से ज्यादा मजबूत करनी होगी। मां की यही बात प्राची के मन में बैठ गई। उन्होंने ठान लिया कि अगली बार पदक का रंग बदलना है।
जापान में 4×400 मीटर रिले में भारतीय टीम के स्वर्ण जीतते ही वह सपना पूरा हो गया। तीन साल पहले मां से किया गया वादा अब स्वर्ण पदक में बदल चुका था।
गांव की चकरोड़ से शुरू हुआ सफर
प्राची की सफलता की कहानी किसी आधुनिक स्टेडियम से शुरू नहीं हुई। झबीरण गांव में सुविधाओं की कमी थी। न कोई बड़ा खेल मैदान और न ही सिंथेटिक ट्रैक। इसके बावजूद प्राची और उनके भाई-बहन गांव की कच्ची-पक्की सड़कों और चकरोड़ पर दौड़ते रहे।

प्राची के पिता जयवीर चौधरी किसान हैं। परिवार में बड़ी बेटी अन्नू और छोटा बेटा प्रियांशु पुलिस विभाग में हैं, जबकि बड़ा बेटा अंकित खेती में पिता का हाथ बंटाता है। पिता बताते हैं कि जब बच्चे दौड़ने की जिद करते थे तो वह उन्हें गांव की सड़कों पर अभ्यास करवाते थे। कई बार बच्चे नंगे पैर तो कभी चप्पलों में ही दौड़ते थे।
परिवार ने अपनी सीमित आर्थिक स्थिति के बावजूद बच्चों के सपनों को रोकने के बजाय उनका साथ दिया। बड़ी बेटी अन्नू के यूपी पुलिस में भर्ती होने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। इसके बाद प्राची को बेहतर प्रशिक्षण दिलाने की कोशिश शुरू हुई। इंटर पास करने के बाद प्राची को स्पोर्ट्स अकादमी भेजा गया। यहीं से उनके खेल करियर ने तेजी पकड़ी।
एक के बाद एक उपलब्धियां
प्राची ने 2018 की प्रदेशीय प्रतियोगिता में 200 और 400 मीटर में स्वर्ण पदक जीता। 2019 में दोहा, कतर में हुई एशियन चैंपियनशिप में उन्होंने रजत पदक हासिल किया। इसी साल चेक गणराज्य में आयोजित प्रतियोगिता में भी उनके खाते में स्वर्ण और रजत पदक आए।
इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका सफर आगे बढ़ता गया। 2023 एशियन गेम्स में रजत पदक और 2024 ओलंपिक में हिस्सा लेना उनके करियर के अहम पड़ाव रहे। अब 2026 एशियन गेम्स का स्वर्ण उनकी उपलब्धियों में जुड़ गया है।
टीवी स्क्रीन पर टिकी थीं परिवार की नजरें
जापान में होने वाली रिले दौड़ को लेकर झबीरण में मंगलवार शाम से ही उत्सुकता थी। प्राची के बड़े भाई अंकित के मुताबिक शाम करीब पांच बजे परिवार के लोग टीवी के सामने बैठ गए थे। करीब साढ़े पांच बजे भारतीय टीम और खिलाड़ियों के नामों की घोषणा हुई तो घर में दुआओं का दौर शुरू हो गया।

दौड़ शुरू हुई तो हर सेकंड परिवार के लिए भारी लग रहा था। सभी की निगाह टीवी स्क्रीन पर थी। भारतीय टीम जैसे ही फिनिश लाइन पर पहुंची और स्वर्ण की पुष्टि हुई, घर में खुशी की लहर दौड़ गई।
अंकित बताते हैं कि परिवार को उम्मीद थी कि प्राची इस बार स्वर्ण पदक जरूर जीतेंगी। उनका कहना है कि प्राची डीएसपी की वर्दी का माप देकर जापान गई हैं। परिवार को उम्मीद है कि खेल उपलब्धि के बाद उनका डीएसपी बनने का सपना भी पूरा होगा।
मां बोलीं- लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया
बेटी की जीत पर मां राजेश बेहद खुश हैं। वह पुराने दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि जब उनके बच्चे गांव की सड़कों पर दौड़ते थे तो कुछ लोगों और महिलाओं ने बेटियों को लेकर टिप्पणियां की थीं। लेकिन उन्होंने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया।
राजेश ने बच्चों को लगातार मेहनत करने के लिए प्रेरित किया। आज जब उनकी बेटियां और बेटा अपने-अपने क्षेत्र में पहचान बना चुके हैं तो वही ग्रामीण बधाई देने पहुंचते हैं। उनका कहना है कि परिवार ने बेटियों को कभी बेटों से कम नहीं समझा। आज प्राची का स्वर्ण पदक इस सोच को और मजबूत करता है।
भाभी तैयार कर रही हैं प्राची का पसंदीदा खाना
प्राची के घर लौटने का परिवार बेसब्री से इंतजार कर रहा है। उनके दो दिन बाद पैतृक गांव पहुंचने की उम्मीद है। भाभी निधि ने उनके स्वागत की तैयारियां शुरू कर दी हैं। निधि के मुताबिक प्राची को घर का खाना बहुत पसंद है।

खासकर आलू के पराठे, सब्जी, पूरियां, लस्सी और मक्खन। अकादमी में यह सब आसानी से नहीं मिलता, इसलिए घर आने पर वह इन चीजों को शौक से खाती हैं। अब परिवार उनके स्वागत के लिए तैयारी में जुटा है।
सरकारी जिम्मेदारी के साथ खेल का सफर
प्राची वर्तमान में जिला युवा कल्याण एवं प्रादेशिक विकास दल अधिकारी के पद पर तैनात हैं। सरकारी जिम्मेदारियों के साथ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर की खेल तैयारियों को भी जारी रखा। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से उन्हें रानी लक्ष्मीबाई अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।
2023 में एशियन गेम्स के रजत पदक के बाद प्रदेश सरकार ने उन्हें डेढ़ करोड़ रुपये की पुरस्कार राशि दी थी और राजपत्रित अधिकारी के पद पर नियुक्ति का अवसर भी दिया था।
जिला एथलेटिक्स संघ के सचिव डॉ. अशोक कुमार गुप्ता के मुताबिक प्राची की उपलब्धि सहारनपुर के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है। उनका कहना है कि गांव और छोटे शहर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करना बड़ी उपलब्धि है।
रजत से स्वर्ण तक पूरी हुई दौड़
प्राची की कहानी एक पदक जीतने की कहानी भर नहीं है। यह उस सफर की कहानी है जो झबीरण की चकरोड़ से शुरू होकर जापान के अंतरराष्ट्रीय ट्रैक तक पहुंचा। 2023 में हांगझोऊ का रजत पदक उनके लिए मंजिल नहीं बना। मां की सीख ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। तीन साल बाद जापान में वही सपना स्वर्ण में बदल गया।
अब झबीरण को अपनी बेटी के लौटने का इंतजार है। गांव में स्वागत की तैयारियां हो रही हैं। जिस बेटी ने कभी इन्हीं कच्ची सड़कों पर दौड़ लगाकर अपने सपनों की शुरुआत की थी, वह अब देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर लौट रही है।हांगझोऊ में पदक का रंग सिल्वर था, जापान में वही रंग गोल्ड हो गया—और इस जीत के साथ प्राची ने मां से किया अपना तीन साल पुराना वादा भी पूरा कर दिया।

