प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के 36 साल पुराने मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे इम्तियाज को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए उसकी दोषसिद्धि रद्द कर दी और उसे हत्या के आरोप से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के तहत किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए सिर्फ घटना में उसकी मौजूदगी या सीमित भूमिका पर्याप्त नहीं है। साझा मंशा, पूर्व योजना और सह-आरोपी के साथ मिलीभगत का ठोस साक्ष्य होना जरूरी है। यह फैसला न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने इम्तियाज की वर्ष 1990 में दाखिल आपराधिक अपील पर सुनाया।
1986 में उधारी के विवाद में हुई थी हत्या
मामला बुलंदशहर के सिकंदराबाद थाना क्षेत्र में 16 मार्च 1986 को हुई हत्या से जुड़ा है। अभियोजन के मुताबिक जंगशेर अपने भाई दलशेर के साथ बाजार जा रहा था। रास्ते में उधार के 3,500 रुपये वापस मांगने को लेकर विवाद हो गया। आरोप था कि इसी दौरान इम्तियाज ने जंगशेर को पकड़ लिया, जबकि उसके भाई फारूक ने उसकी पीठ पर चाकू से वार कर दिया। गंभीर चोट लगने से जंगशेर की मौत हो गई।
मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने 30 जुलाई 1990 को इम्तियाज को धारा 302/34 और फारूक को धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में अपील लंबित रहने के दौरान फारूक की मौत हो गई।
इम्तियाज के खिलाफ नहीं मिला ठोस साक्ष्य
हाईकोर्ट में इम्तियाज की ओर से दलील दी गई कि हत्या फारूक ने की थी और उसके खिलाफ सिर्फ मृतक को पकड़ने की भूमिका बताई गई है। उसके पास से हत्या से जुड़ी कोई आपत्तिजनक वस्तु बरामद नहीं हुई थी। हत्या में इस्तेमाल चाकू भी फारूक की निशानदेही पर बरामद हुआ था। कोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा के बाद पाया कि इम्तियाज के खिलाफ मृतक को पकड़ने के अलावा कोई अन्य ठोस आपत्तिजनक साक्ष्य नहीं है।
साझा मंशा साबित नहीं हुई
खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में ऐसा स्पष्ट निष्कर्ष नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि इम्तियाज और फारूक के बीच हत्या की पूर्व योजना या पहले से मिलीभगत थी। धारा 34 के तहत दोषसिद्धि के लिए साझा आपराधिक मंशा का होना और उसका साक्ष्य से साबित होना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए इम्तियाज को धारा 302/34 के आरोप से बरी कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे जेल से तत्काल रिहा किया जाए।

