‘उत्तराखंड को दूसरा नेपाल न बनाओ’, किशाऊ बांध के विरोध में 20 गांवों के लोग सड़क पर

Kishau Dam Project

विकासनगर (देहरादून) : उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को केंद्र से मंजूरी मिलने के बाद प्रभावित गांवों में विरोध तेज हो गया है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के करीब 20 गांवों के ग्रामीण क्वाणू गांव में एकत्र हुए और परियोजना के विरोध में प्रदर्शन करते हुए चक्का जाम किया। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन कालसी के एसडीएम प्रेमलाल को सौंपकर अपनी मांगों पर तत्काल कार्रवाई की मांग की।

ग्रामीणों का कहना है कि उनका विरोध बांध परियोजना से नहीं, बल्कि प्रस्तावित स्थल और उससे होने वाले विस्थापन को लेकर है। उनका आरोप है कि दशकों से परियोजना की चर्चा होने के बावजूद प्रभावित ग्रामीणों के साथ पर्याप्त औपचारिक संवाद नहीं किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि पहले उनकी समस्याएं सुनी जातीं और वैकल्पिक स्थानों पर विचार किया जाता तो आज आंदोलन की स्थिति नहीं बनती।

उपजाऊ जमीन डूबने का डर

किशाऊ बांध प्रभावित संरक्षक समिति के संरक्षक मुन्ना राणा ने कहा कि क्वाणू और आसपास का इलाका बेहद उपजाऊ है। यहां की बड़ी मात्रा में कृषि भूमि परियोजना की चपेट में आने की आशंका है। उनका कहना है कि ग्रामीण बांध बनाने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन परियोजना के लिए सुरक्षित और उपयुक्त स्थान का चयन किया जाना चाहिए।

राणा ने प्रस्तावित क्षेत्र की भूगर्भीय स्थिति पर भी सवाल उठाए। उनका दावा है कि कई स्थानों पर जमीन धंसने की स्थिति है और सुरंग निर्माण के प्रयासों के दौरान मशीनों के फंसने की घटनाएं हुई हैं। उन्होंने सरकार से परियोजना के तकनीकी पहलुओं और स्थल का दोबारा परीक्षण कराने की मांग की।

प्रभावित संघर्ष समिति के अध्यक्ष सूर्य प्रताप सिंह चौहान ने कहा कि उत्तराखंड और हिमाचल के ग्रामीण अपनी ‘थाती-माटी’ बचाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2023 में कालसी तहसील में प्रशासन और विभागीय अधिकारियों के साथ बैठक हुई थी, लेकिन इसके बाद ग्रामीणों के साथ लगातार संवाद नहीं हुआ।

अटाल की तरफ शिफ्ट करने की मांग

ग्रामीणों ने परियोजना को अटाल की ओर करीब सात से आठ किलोमीटर आगे ले जाकर नए सिरे से सर्वे कराने की मांग की है। उनका कहना है कि ऐसा करने से क्वाणू और आसपास की उपजाऊ भूमि तथा पुरानी विरासत को नुकसान से बचाया जा सकता है।

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर क्षेत्र के प्रभावित ग्रामीण सोहन ठाकुर ने कहा कि यदि विस्थापन होता है तो प्रभावित परिवारों के लिए स्पष्ट और उचित मुआवजा तथा पुनर्वास नीति तय की जानी चाहिए। उन्होंने सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय परंपराओं को भी पुनर्वास योजना में शामिल करने की मांग की।

प्रशासन ने लिया ज्ञापन

एसडीएम चकराता प्रेमलाल ने बताया कि किशाऊ बांध परियोजना संघर्ष समिति ने प्रदर्शन की जानकारी प्रशासन को पहले ही दी थी। ग्रामीणों ने अपनी मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपा है। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्वाणू की उपजाऊ जमीन और पुरानी विरासत को बचाने की मांग कर रहे हैं। साथ ही परियोजना को अटाल की ओर आगे ले जाकर सर्वे कराने का सुझाव दिया गया है।

छह राज्यों के बीच हुआ एमओयू

किशाऊ बांध परियोजना लंबे समय से पानी के बंटवारे, लागत और तकनीकी मुद्दों के कारण लंबित रही है। 15 सितंबर को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बीच परियोजना को लेकर एमओयू पर हस्ताक्षर हुए। इसके बाद परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ।

परियोजना से करीब 660 मेगावाट बिजली उत्पादन की संभावना जताई गई है। इसकी शुरुआती अनुमानित लागत करीब 7 हजार करोड़ रुपये थी, जो अब बढ़कर 15,624 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। परियोजना से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के 17 गांवों के करीब 5 हजार लोगों के विस्थापन की बात सामने आई है।

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी जमीन, पुनर्वास और विरासत से जुड़े मुद्दों पर समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। फिलहाल प्रशासन के सामने परियोजना की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के साथ प्रभावित ग्रामीणों की आपत्तियों और मांगों पर विचार करने की चुनौती है।

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