नागपुर (महाराष्ट्र) : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विजयादशमी समारोह में देश में होने वाले आंदोलनों, राजनीतिक उथल-पुथल, वैश्विक शक्तियों के प्रभाव, युवाओं में नशे की समस्या और OTT प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन होना स्वाभाविक है, लेकिन आंदोलनों का उद्देश्य समस्याओं का समाधान निकालना होना चाहिए, न कि केवल सत्ता परिवर्तन या राजनीतिक लाभ हासिल करना।
भागवत ने कहा कि समाज और व्यवस्था में कमियां होने के कारण लोग अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करते हैं। हालांकि, जब विरोध प्रदर्शन जनहित से हटकर राजनीतिक स्वार्थ का माध्यम बन जाते हैं, तो वे समाधान देने के बजाय समाज में कटुता और विभाजन बढ़ा सकते हैं। उन्होंने संविधान की मर्यादा, सभ्य संवाद और शिष्ट आचरण का पालन करने पर जोर दिया।
सत्ता बदलने से बुनियादी समस्याएं खत्म नहीं होतीं
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि बड़े समाज में समस्याएं होना स्वाभाविक है। व्यवस्था में भी कमियां हो सकती हैं, जिनके खिलाफ लोगों का आवाज उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन आंदोलन का मकसद किसी व्यवस्था को बदलने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसका वास्तविक उद्देश्य समस्याओं का स्थायी समाधान खोजना होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सत्ता परिवर्तन से बुनियादी चुनौतियां अपने आप समाप्त नहीं हो जातीं। यदि समस्याओं के मूल कारणों पर ध्यान नहीं दिया जाए, तो राजनीतिक बदलाव के बाद भी परिस्थितियां बनी रह सकती हैं। भागवत ने राजनीतिक नेताओं, प्रदर्शनकारियों और प्रशासन से अपील की कि वे अपने कार्यों से समाज में कड़वाहट और दूरियां बढ़ने से बचाएं। उन्होंने कहा कि भावनाएं कितनी भी तीव्र क्यों न हों, सभी को संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं और सार्वजनिक चर्चा के मानकों का सम्मान करना चाहिए।
बांग्लादेश, नेपाल और अन्य देशों का किया उल्लेख
संघ प्रमुख ने बांग्लादेश, नेपाल, फ्रांस और अल्बानिया में हुई राजनीतिक उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ ताकतें अपने हितों के लिए राजनीतिक परिस्थितियों का इस्तेमाल करती हैं। उनके अनुसार, सत्ता परिवर्तन को अक्सर समस्याओं के समाधान के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन इससे जरूरी नहीं कि आम लोगों की बुनियादी चुनौतियां दूर हो जाएं।
भागवत ने दावा किया कि कुछ वैश्विक शक्तियां भारत के विकास का समर्थन तो करती हैं, लेकिन नहीं चाहतीं कि देश इतना शक्तिशाली बन जाए कि उनके प्रभुत्व को चुनौती दे सके। उन्होंने कहा कि भारत का मजबूत होना ऐसी ताकतों के लिए चुनौती बन सकता है, जो अपने हितों को सर्वोपरि रखती हैं।
उन्होंने भारत को कमजोर और विभाजित करने की कोशिशों को लेकर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक, देश को मजबूत बनाने के लिए सामाजिक एकता, विवेकपूर्ण सोच और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
भारत और हिंदू समाज को बांटने की कोशिशों का आरोप
मोहन भागवत ने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें भारत, हिंदू समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विभाजित करने के उद्देश्य से योजनाबद्ध तरीके से काम करती हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग अपने छोटे राजनीतिक हितों और महत्वाकांक्षाओं के कारण ऐसी कोशिशों में सहयोग कर सकते हैं।
उन्होंने नई पीढ़ी पर सूचना के बढ़ते प्रभाव का भी उल्लेख किया। भागवत के अनुसार, युवा विभिन्न माध्यमों से मिलने वाली जानकारियों को कई बार सही और गलत का विवेक किए बिना स्वीकार कर लेते हैं। इससे उनके विचारों और व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि युवाओं को तथ्यों की जांच करने, सूचनाओं की विश्वसनीयता समझने और जिम्मेदारी के साथ राय बनाने के लिए प्रेरित करना जरूरी है। परिवार और समाज की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है।
OTT प्लेटफॉर्म पर सामग्री को लेकर जताई चिंता
संघ प्रमुख ने डिजिटल माध्यमों और OTT प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि विभिन्न माध्यमों से मिलने वाली सामग्री नई पीढ़ी के विचारों और व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में सामग्री के प्रभाव और उससे जुड़े संभावित दुष्परिणामों पर विचार करना आवश्यक है।
भागवत ने कहा कि कई देशों ने डिजिटल सामग्री को लेकर कुछ नियम और प्रतिबंध लागू किए हैं। भारत में भी विशेष रूप से OTT प्लेटफॉर्म के संबंध में ऐसी जरूरत महसूस की जा रही है। उन्होंने शासन और प्रशासन से इस विषय पर विचार करने की बात कही। इस मुद्दे पर नियम बनाते समय बच्चों और युवाओं की सुरक्षा के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा रचनात्मकता के बीच संतुलन बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होगा।
युवाओं में नशे की समस्या को बताया गंभीर चुनौती
मोहन भागवत ने युवाओं में नशीले पदार्थों की बढ़ती समस्या पर चिंता जताते हुए इसे गंभीर राष्ट्रीय चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में नई पीढ़ी नशे की आदत का शिकार हो रही है। इस समस्या को रोकने के लिए शासन-प्रशासन और समाज को समय रहते प्रयास शुरू करने चाहिए।
उन्होंने कहा कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल सरकारी कार्रवाई से नहीं जीती जा सकती। परिवार, समाज और प्रशासन को मिलकर युवाओं को जागरूक करना होगा। नशीले पदार्थों की उपलब्धता पर रोक लगाने के साथ-साथ युवाओं को सही मार्गदर्शन और सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ना भी जरूरी है।
भागवत ने कहा कि वर्तमान अभिभावक पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह नई पीढ़ी को सही और गलत के बीच अंतर समझने का विवेक दे, ताकि युवा दबाव और गलत संगति के बीच सही निर्णय ले सकें।
विकास में प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन जरूरी
अपने संबोधन में भागवत ने विज्ञान और तकनीक की भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा कि ये मानव जीवन को सुविधाजनक बनाने और ज्ञान बढ़ाने में मदद करते हैं। हालांकि, विकास को केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और उपभोग तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
उन्होंने नेपाल में हुई भीषण त्रासदी का उल्लेख करते हुए हिमालयी क्षेत्र में विकास की दिशा पर विचार करने की जरूरत बताई। उनके अनुसार, भारत, तिब्बत, भूटान और चीन तक फैले हिमालयी क्षेत्र में विकास संबंधी फैसले लेते समय पर्यावरणीय संतुलन और दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
भागवत ने कहा कि एकांगी विकास के बजाय समग्र और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। उनके विजयादशमी संबोधन का प्रमुख संदेश यही रहा कि देश की मजबूती के लिए सामाजिक एकता, जिम्मेदार नागरिकता, नशे के खिलाफ सामूहिक प्रयास और पर्यावरण के अनुकूल विकास जरूरी हैं।

