सहारनपुर : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सियासी गतिविधियां तेज होने लगी हैं। सहारनपुर में समाजवादी पार्टी के पूर्व एमएलसी और PDA की राजनीति से जुड़े नेता राजपाल कश्यप ने आरक्षण, रोजगार, पेपर लीक, किसान, गन्ना भुगतान और सामाजिक भागीदारी जैसे मुद्दों को उठाकर चुनावी बहस की दिशा साफ करने की कोशिश की। अंबाला रोड स्थित सपा कार्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने भाजपा सरकार पर कई आरोप लगाए और कहा कि आने वाले समय में PDA के मुद्दों को गांव-गांव तक ले जाया जाएगा।
राजपाल कश्यप का सहारनपुर दौरा ऐसे समय हुआ है जब समाजवादी पार्टी पश्चिमी यूपी में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को जोड़ने वाली अपनी राजनीतिक रणनीति को संगठनात्मक कार्यक्रमों के जरिए आगे बढ़ा रही है। वहीं भाजपा भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2027 की तैयारियों को लेकर संगठनात्मक बैठकों का सिलसिला तेज कर चुकी है। 22 सितंबर को भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने सहारनपुर में पूर्व जनप्रतिनिधियों और वर्तमान पदाधिकारियों के साथ बैठकें की थीं। इन बैठकों में संगठन और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर चर्चा हुई थी।
आरक्षण के सवाल पर 17 जातियों का मुद्दा
राजपाल कश्यप ने अपने भाषण में कश्यप, निषाद, बिंद, धीमर, मल्लाह, कहार, माझी, मझवार, तुरहा, भर, राजभर और प्रजापति समेत 17 अति-पिछड़ी जातियों का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि इन समुदायों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से मांग चल रही है।
इन 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का मुद्दा नया नहीं है। संसद के रिकॉर्ड में भी उत्तर प्रदेश की 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने से संबंधित प्रस्तावों और राज्य सरकार की ओर से केंद्र को भेजे गए पत्रों का उल्लेख मिलता है।
सहारनपुर में भी कश्यप और अन्य अति-पिछड़ी जातियों की ओर से इस मांग को लेकर पहले कई बार प्रदर्शन और पंचायतें हो चुकी हैं। ऐसे में राजपाल कश्यप द्वारा इसे 2027 की राजनीतिक बहस से जोड़ना सपा की सामाजिक भागीदारी वाली रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
सहयोगी दलों के नेताओं पर भी निशाना
राजपाल कश्यप ने भाजपा के सहयोगी दलों से जुड़े नेताओं अनिल राजभर, संजय निषाद और अनुप्रिया पटेल का नाम लेते हुए भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि ये नेता अपने-अपने समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं तो उन्हें आरक्षण और सामाजिक अधिकारों के सवाल पर सरकार के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
इसी दौरान उन्होंने भाजपा के सहयोगी नेताओं को लेकर तीखी टिप्पणी भी की। हालांकि यह राजपाल कश्यप का राजनीतिक बयान था और कार्यक्रम के दौरान भाजपा या संबंधित नेताओं की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
सपा की रणनीति में यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि PDA का राजनीतिक फ्रेम केवल सपा के पारंपरिक समर्थक वर्गों तक सीमित नहीं है। पार्टी पिछड़े और अति-पिछड़े समुदायों के बीच सामाजिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण और सत्ता में भागीदारी को लेकर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
रोजगार और पेपर लीक पर युवाओं को साधने की कोशिश
राजपाल कश्यप ने युवाओं से जुड़े सवालों को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने पेपर लीक, सरकारी भर्तियों, आउटसोर्सिंग, संविदा नौकरियों और अग्निवीर योजना को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा।
उन्होंने ई-रिक्शा को रोजगार के विकल्प के तौर पर पेश किए जाने वाले तर्क पर भी सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि यदि ई-रिक्शा चलाना ही युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार है तो मंत्री और उनके परिवारों के लोगों को भी इसे अपनाना चाहिए।
राजपाल कश्यप का यह हमला उन युवाओं से जुड़े सवालों पर केंद्रित था जो प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी नौकरियों और स्थायी रोजगार की तलाश में हैं। PDA की राजनीति में रोजगार के मुद्दे को शामिल करने से सपा सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल को आर्थिक और युवा मुद्दों से जोड़ने की कोशिश करती दिखाई देती है।
किसान और गन्ना भुगतान भी एजेंडे में
सहारनपुर और पश्चिमी यूपी की राजनीति में किसान और गन्ना भुगतान लंबे समय से महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। राजपाल कश्यप ने गन्ना भुगतान को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए।
उन्होंने सरकार के 14 दिन में गन्ना भुगतान के वादे का उल्लेख करते हुए बकाया भुगतान का मुद्दा उठाया। साथ ही उन्होंने कहा कि सत्ता में आने पर अखिलेश यादव किसानों को 24 घंटे में गन्ने का भुगतान कराने और लाभकारी मूल्य देने की बात कह चुके हैं।
इससे सपा के मौजूदा राजनीतिक अभियान का एक और पहलू सामने आता है। PDA को केवल जातीय-सामाजिक समीकरण के तौर पर पेश करने के बजाय पार्टी रोजगार, किसान, गन्ना भुगतान और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को भी इससे जोड़ने की कोशिश कर रही है।
भाजपा ने भी बढ़ाई संगठनात्मक सक्रियता
दूसरी ओर भाजपा पश्चिमी यूपी में अपनी संगठनात्मक तैयारियों पर जोर दे रही है। सितंबर में भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन के सहारनपुर दौरे में पूर्व जनप्रतिनिधियों और वर्तमान पदाधिकारियों के साथ अलग-अलग बैठकें हुईं। रिपोर्टों के अनुसार, इन बैठकों में संगठन की स्थिति और 2027 की तैयारियों पर चर्चा हुई। नितिन नबीन के कार्यक्रम में सामाजिक संपर्क का हिस्सा भी शामिल रहा।
उन्होंने रविदास मंदिर में दर्शन किए और एक दलित कार्यकर्ता के घर भोजन किया। यानी सहारनपुर में फिलहाल दो अलग-अलग राजनीतिक अभियानों की गतिविधियां दिखाई दे रही हैं। सपा सामाजिक गठजोड़, PDA और मुद्दा आधारित राजनीतिक संवाद के जरिए अपना आधार मजबूत करने में जुटी है, जबकि भाजपा संगठनात्मक बैठकों और सामाजिक संपर्क के माध्यम से अपनी तैयारियां आगे बढ़ा रही है।
सीट बंटवारे पर अंतिम फैसला अखिलेश पर
2027 के चुनाव में सीट बंटवारे और संभावित गठबंधन के सवाल पर राजपाल कश्यप ने कहा कि अंतिम निर्णय सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव करेंगे। उन्होंने कहा कि चुनावी लड़ाई किसी एक व्यक्ति के टिकट तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
राजपाल कश्यप ने यह भी कहा कि यदि उनकी सीट छोड़ने से भाजपा को रोकने में मदद मिलती है तो वह सीट छोड़ने के लिए तैयार हैं। हालांकि उनके इस बयान से किसी संभावित गठबंधन या सीट बंटवारे का अंतिम स्वरूप तय नहीं माना जा सकता।
2027 से पहले सहारनपुर क्यों अहम
सहारनपुर पश्चिमी यूपी का ऐसा क्षेत्र है जहां सामाजिक समीकरण, किसान राजनीति, रोजगार और स्थानीय मुद्दे एक साथ राजनीतिक बहस को प्रभावित करते हैं। इसलिए यहां होने वाली राजनीतिक गतिविधियों का असर केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहता।
राजपाल कश्यप के दौरे से सपा ने आरक्षण और सामाजिक भागीदारी को फिर केंद्र में लाने की कोशिश की है। इसके साथ रोजगार, पेपर लीक, किसान और गन्ना भुगतान जैसे मुद्दे जोड़कर PDA के दायरे को व्यापक बनाने का प्रयास दिखाई देता है। हालांकि किसी राजनीतिक दल की रणनीति और उसके चुनावी प्रदर्शन के बीच सीधा संबंध मानना जल्दबाजी होगी। 2027 तक उम्मीदवार, गठबंधन, स्थानीय समीकरण और मुद्दे बदल सकते हैं।
फिलहाल सहारनपुर से राजपाल कश्यप का संदेश इतना स्पष्ट है कि समाजवादी पार्टी PDA को केवल नारे के तौर पर नहीं, बल्कि संगठन और राजनीतिक अभियान के हिस्से के रूप में आगे बढ़ाना चाहती है। दूसरी ओर भाजपा भी पश्चिमी यूपी में संगठन को सक्रिय करने और जमीनी तैयारियों को मजबूत करने में लगी है। ऐसे में 2027 से पहले सहारनपुर में आरक्षण, रोजगार, किसान, सामाजिक भागीदारी और संगठन—इन सभी मुद्दों के इर्द-गिर्द राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।

