सहारनपुर : सावन का महीना शुरू होते ही देव भूमि हरिद्वार में शिव भगतों की भीड़ उमड़ पड़ती है। हर की पैड़ी से कावड़ में गंगाजल भर कर शिव भगत कावड़िये अपने गंतव्यों की और बढ़ रहे हैं। कावड़िये लाखों रूपये खर्च कर एक से बढ़ कर एक अनोखी कावड़ लेकर आ रहे हैं। इसी बीच चंडीगढ़ के बहु और बेटे की अनोखी कावड़ हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। चंडीगढ़ के राजकुमार अपनी पत्नी और भाभी के साथ पालकी में अपनी मां बिठाकर हरिद्वार से चंडीगढ़ के लिए पैदल यात्रा कर रहे हैं। ख़ास बात ये है कि बेटे के साथ बहुएं भी कावड़ में बैठी अपनी सास जयदेई को कंधो पर उठाकर चल रही हैं। यही वजह है कि कावड़ में बैठी बूढ़ी मां अपने बेटों और बहुओं को आशीर्वाद देते नहीं थक रही। परिवार के लोगों ने इस कावड़ का नाम श्रवण कावड़ दिया है। राजकुमार का कहना है कि मेरे परिवार में सभी प्रेम से मिलजुल कर रहते हैं कावड़ के जरिये वह अपने परिवार में सद्भाव और प्यार बनाये रखने की नाथो के नाथ भोले नाथ से करते हैं।

आपको बता दें कि 21वीं सदी में जब लोग रिश्तों को महज एक औपचारिकता मानने लगे है, ऐसे में आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो रिश्तों को अहमियत देते है। धर्मनगरी हरिद्वार में कावड़ यात्रा के दौरान एक अनोखी तस्वीर देखने को मिली है। यहां एक परिवार (कलयुग का श्रवण कुमार) कावड़ उठाने के साथ बच्चे अपने माता पिता को पालकी में बैठाकर तीर्थ की यात्रा करवा रहे है। बेटे के साथ दो बहुएं भी इस शुभ काम में कंधे से कंधा मिलाकर साथ चल रही हैं। यह परिवार मूल रूप से हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ का रहने वाला है। एक अगस्त को हर की पैड़ी पर उन्होंने सबसे पहले बूढी अम्मा के पैर धोए और गंगा जी में स्नान कराया। इसके बाद कावड़ में गंगाजल भर कर माँ जयदेई को पालकी में बिठा कंधो पर उठाया और अपने गंतव्य की ओर निकल पड़े।
चार दिन की पैदल यात्रा के बाद मंगलवार की शाम यह परिवार श्रवण कावड़ लेकर सहारनपुर पहुंचे। जहां उन्हें देखने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी। हर कोई बेटे राजकुमार के साथ दोनों बहुएं पूजा और केतकी की खूब सरहना कर रहा है। जिस दौर में बहुएं अपने मायके से ऑनलाइन क्लॉस लेकर अपनी सास को न बाहर निकालने पर उतारू रहती हैं बल्कि कुछ बहुएं तो बूढ़े सास-ससुर को वृद्धाश्रम तक छोड़ देती हैं। उस दौर में केतकी (बड़ी बहु ) और पूजा ( छोटी बहु ) अपनी सास की सास नहीं बल्कि अपनी माँ की तरह सेवा कर रही हैं। जिसकी बानगी कावड़ में बैठी बूढी माँ और कंधो पर उठाकर चल रही बहुएं खुद पेश कर रही हैं। बड़ी बहु केतकी बताती हैं कि उनके माता-पिता ने जो संस्कार दिए हैं वह उन्ही का पालन कर रही हैं। वे अपनी सास के साथ माँ की तरह रहती है। उनकी सास उन्हें अपनी बेटियों की तरह प्यार करती हैं। आज अपनी सास कावड़ में लाकर दिल और आत्मा को अलग ही शकुन मिल रहा है।
वहीं छोटी बहु पूजा का कहना है कि उनकी सास उनके साथ सास जैसा व्यवहार किया ही नहीं उन्हें कभी ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि वह अपनी ससुराल में आई हुई है। वह दोनों बहुओं के साथ बेटियों जैसा ही सलूक करती है। पूरा परिवार मिलजुल कर एक ही घर में रहता है और एक ही चूल्हे पर खाना बनाकर खाता है। अपनी बूढी सास की सेवा करके उन्हें बहुत अच्छा लगता है। कभी कबाक गलती होने पर उनकी सास जयदेई उन्हें डांट तो देती हैं लेकिन कभी लड़ाई नहीं करती है। यही वजह है आज उनका पूरा परिवार एक साथ प्यार से रहता है।
बेटे राजकुमार का कहना है कि यह सब उनकी माँ जयदेई के संस्कार और आशीर्वाद ही है जो उनका परिवार प्यार से एक साथ रहता है। यूँ तो वह पांच साल तक पैदल कावड़ लेकर आया लेकिन ऐसी श्रवण कावड़ पहली बार ही लेकर आये हैं। उसने पांच साल पहले मन बनाया था कि अब जब भी कावड़ लाएंगे तो श्रवण कावड़ ही लाएंगे। इस बार वह अपनी भाभी और पत्नी साथ बच्चो को लेकर श्रवण कावड़ लेने निकल पड़े। माँ जयदेई को कावड़ में बिठाकर चडीगढ़ की ओर बढ़ रहे हैं।
उनका कहना है कि जब माता-पिता कई-कई बच्चों का पालन पोषण कर उन्हें पढ़ा-लिखाकर काबिल कर सकते है तो ऐसे में बच्चों को भी चाहिए कि अपने माता-पिता की सेवा करें। राजकुमार ने उन लोगों को भी नसीयत दी है जो बूढ़ा होने पर अपने माता- वृध्दाश्रम छोड़ आते हैं। मैं चाहता हूं कि सभी को मेरे जैसा होना चाहिए. वह अपना काम कर रहे हैं, हम अपना काम कर रहे हैं, सेवा करने का हमारा दायित्व बनता है। कावड़ में बैठी जयदेई ने अपने श्रवण कुमार बेटे और बहुओं के लिए कहा है कि भगवान उन्हें सुखी रखे, धनदौलत से सुखी रखें, खुश रहे, भगवान खुश रखे, भगवान इनको जीते जी खुश रखे. फिलहाल कांवड़ यात्रा के दौरान कलयुग के श्रवण कुमार को जो भी देख रहा है तारीफ ही करता नजर आ रहा है.
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