उत्तराखंड : उत्तराखंड में मानसून की दस्तक से पहले राज्य के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। भारत सरकार ने उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम (Cell Broadcast System) के उपयोग पर लगी अस्थायी रोक हटा दी है। इस फैसले के बाद अब किसी भी आपदा या आपातकालीन स्थिति में प्रभावित क्षेत्र में मौजूद लोगों के मोबाइल फोन पर कुछ ही सेकेंड में चेतावनी संदेश भेजे जा सकेंगे।
यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब उत्तराखंड में मानसून सक्रिय होने वाला है और चारधाम यात्रा भी जारी है। पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम का अचानक बदलना, भूस्खलन, बादल फटना और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाएं अक्सर सामने आती हैं। ऐसे में समय पर मिलने वाली चेतावनी कई लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
गौरतलब है कि मई 2026 में देशभर में सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम शुरू किया गया था, लेकिन कुछ तकनीकी और प्रक्रियागत कारणों के चलते राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने जून में इसके उपयोग पर अस्थायी रोक लगा दी थी। उत्तराखंड सरकार ने केंद्र से अनुरोध किया कि राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों और आपदा जोखिम को देखते हुए इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाए।
आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि राज्य सरकार ने केंद्र के समक्ष यह स्पष्ट किया था कि जिन तकनीकी कारणों की समीक्षा की जा रही है, उनका उत्तराखंड की आपदा चेतावनी प्रणाली से सीधा संबंध नहीं है। राज्य की जरूरतों को देखते हुए केंद्र सरकार ने उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के लिए इस प्रतिबंध को हटाने का फैसला किया।
सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम सामान्य एसएमएस सेवा से अलग है। इसमें किसी व्यक्ति का मोबाइल नंबर दर्ज करने की जरूरत नहीं होती। प्रशासन किसी विशेष क्षेत्र को चिन्हित कर उस इलाके में मौजूद सभी मोबाइल फोन पर एक साथ चेतावनी संदेश भेज सकता है। यह तकनीक इंटरनेट के बिना भी 2G, 3G, 4G और 5G नेटवर्क पर प्रभावी ढंग से काम करती है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी क्षेत्र में बादल फटने, भूस्खलन, नदी का जलस्तर बढ़ने या फ्लैश फ्लड का खतरा हो, तो उसी इलाके में मौजूद लोगों को तुरंत अलर्ट भेजा जा सकता है। मोबाइल फोन पर तेज अलार्म के साथ संदेश दिखाई देता है, जिससे लोग खतरे के प्रति तुरंत सतर्क हो जाते हैं।
आपदा प्रबंधन विभाग ने स्पष्ट किया है कि अब इस प्रणाली का उपयोग केवल वास्तविक आपातकालीन परिस्थितियों में ही किया जाएगा। नियमित परीक्षण फिलहाल नहीं होंगे, क्योंकि उत्तराखंड में इसकी टेस्टिंग पहले ही पूरी की जा चुकी है। अधिकारियों का मानना है कि यह तकनीक राज्य की आपदा प्रबंधन व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाएगी तथा मानसून और चारधाम यात्रा के दौरान लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

