पद यात्रा के बाद अब डाक कांवड़ की बारी, सड़कों पर बाइक और गाड़ियों के साथ दौड़ने लगे शिव भगत

After the padayatra it's now the turn of the dak kanwad, Shiva devotees racing on the roads with bikes and cars.

सहारनपुर : सावन का महीना शुरू होते ही हरिद्वार से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों तक कांवड़ यात्रा का रंग दिखाई देने लगता है। हर की पैड़ी से गंगाजल भरकर लाखों शिवभक्त अपने-अपने शिवालयों की ओर रवाना होते हैं। सावन के शुरुआती दिनों में जहां कांवड़ मार्गों पर पैदल कांवड़ियों की भीड़ रहती है, वहीं महाशिवरात्रि नजदीक आते ही अब डाक कांवड़ और सुपर फास्ट कांवड़ का दौर शुरू हो गया है।सहारनपुर से गुजरने वाले कांवड़ मार्गों पर भी डाक कांवड़ियों की संख्या बढ़ गई है। बाइक और गाड़ियों के साथ कांवड़ियों के समूह तेजी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं। कई युवा कांवड़ लेकर दौड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। इन कांवड़ियों का मुख्य लक्ष्य निर्धारित समय के भीतर अपने शिवालय तक पहुंचकर जलाभिषेक करना है।

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समय के खिलाफ दौड़

डाक कांवड़ की सबसे बड़ी खासियत इसका निर्धारित समय है। कांवड़िए हरिद्वार पहुंचने से पहले ही तय कर लेते हैं कि उन्हें कितने घंटे में अपने गंतव्य तक पहुंचना है। अलग-अलग दूरी के हिसाब से टीमें अपना समय निर्धारित करती हैं। हरियाणा जाने वाली कुछ डाक कांवड़ टीमें करीब 16 से 25 घंटे का लक्ष्य लेकर चलती हैं, जबकि राजस्थान तक जाने वाली टीमों के लिए 40 से 60 घंटे तक का समय निर्धारित किया जाता है। कई कारों और अन्य वाहनों पर टीम के नाम के साथ निर्धारित समय और गंतव्य भी लिखा होता है। हर की पैड़ी पर गंगा स्नान और पूजा-अर्चना करने के बाद कांवड़िए पवित्र गंगाजल लेकर वापस रवाना होते हैं।

जमीन पर नहीं रखा जाता गंगाजल

डाक कांवड़ की खास परंपरा यह है कि कांवड़ में भरा गंगाजल जमीन पर नहीं रखा जाता। कांवड़ियों का समूह लगातार आगे बढ़ता रहता है। एक कांवड़िया कुछ दूरी तक दौड़ता है और इसके बाद गंगाजल दूसरे कांवड़िए को सौंप दिया जाता है। इस दौरान पीछे-पीछे बाइक या अन्य वाहन भी चलते रहते हैं। इसी तरह बारी-बारी से कांवड़ एक-दूसरे को सौंपते हुए यात्रा जारी रहती है और गंगाजल को बिना जमीन पर रखे निर्धारित शिवालय तक पहुंचाया जाता है।

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युवाओं में बढ़ा डाक कांवड़ का क्रेज

डाक कांवड़ में युवाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। पढ़ाई, नौकरी और रोजगार की व्यस्तता के कारण कई युवा कम समय में हरिद्वार से गंगाजल लाकर अपने क्षेत्र के शिवालय में जलाभिषेक करना चाहते हैं। कई समूहों में 20 से 40 तक युवा शामिल होते हैं। कुछ कांवड़िए दौड़ते हैं और कुछ उनके साथ वाहनों से चलते हैं। तय दूरी के बाद कांवड़ दूसरे सदस्य को सौंप दी जाती है और यात्रा लगातार जारी रहती है। हालांकि समय की होड़ में कुछ जगहों पर यातायात नियमों की अनदेखी भी देखने को मिलती है। कई बाइक पर क्षमता से अधिक लोग सवार दिखाई देते हैं। कुछ बाइक के साइलेंसर निकालकर तेज आवाज के साथ चलाए जाते हैं। तेज रफ्तार और लापरवाही से हादसे का खतरा भी बढ़ जाता है।

कांवड़ मार्गों पर बढ़ी हलचल

महाशिवरात्रि नजदीक आने के साथ कांवड़ मार्गों पर भीड़ लगातार बढ़ रही है। स्थानीय लोग और कांवड़ सेवा समितियां रास्ते में शिवभक्तों के स्वागत और सेवा में जुटी हैं। जगह-जगह भोजन, पानी और आराम की व्यवस्था की गई है। सड़कों पर ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे सुनाई दे रहे हैं। हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौट रहे कांवड़ियों में खासा उत्साह दिखाई दे रहा है। डाक कांवड़ को भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और संकल्प का प्रतीक माना जाता है। हालांकि शास्त्रों में डाक कांवड़ का विशेष उल्लेख नहीं मिलता।

निरंजनी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रामरतन गिरी के अनुसार, डाक कांवड़ के बारे में शास्त्रों में विशेष जानकारी नहीं है, लेकिन पवित्र गंगाजल को जमीन पर नहीं रखने की परंपरा इसमें महत्वपूर्ण मानी जाती है। पिछले करीब दो दशकों में डाक कांवड़ का चलन तेजी से बढ़ा है। आज सावन के अंतिम दिनों में हरिद्वार से दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक जाने वाले मार्गों पर बड़ी संख्या में डाक कांवड़ दिखाई देती हैं। आस्था की इस यात्रा में उत्साह और जोश के साथ सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है, ताकि हर शिवभक्त सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचे और भोलेनाथ का जलाभिषेक कर सके।

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