सहारनपुर : कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद का मलबा हटाने के दौरान सामने आई करीब 20 फीट गहरी संरचना अब जांच का केंद्र बन गई है। संरचना मिलने के बाद प्रशासन ने पुरातत्व विभाग को इसकी जानकारी दी। सोमवार को लखनऊ से पुरातत्व विभाग की टीम सहारनपुर पहुंची और मौके पर पहुंचकर करीब 20 फीट नीचे उतरकर संरचना का बारीकी से निरीक्षण किया। टीम ने निर्माण सामग्री और संरचना से जुड़े कुछ सैंपल भी लिए हैं। फिलहाल पुरातत्व विभाग ने इसे केवल ‘कूप जैसी संरचना’ बताया है और अंतिम निष्कर्ष देने से पहले विस्तृत जांच की जरूरत बताई है।

मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद जब शनिवार और रविवार को मलबा हटाने का काम किया जा रहा था, तभी जमीन के नीचे एक भारी स्लैब सामने आया। मशीन से स्लैब को हटाने का प्रयास किया गया, लेकिन वह काफी मजबूत होने के कारण नहीं टूटा। इसके बाद कटर की मदद से स्लैब को काटा गया। स्लैब हटने के बाद उसके नीचे गहरी संरचना दिखाई दी। मौके पर मौजूद अधिकारियों ने इसकी सूचना प्रशासन को दी।
एसडीएम सदर सुबोध कुमार के मुताबिक संरचना की गहराई करीब 20 फीट और चौड़ाई लगभग तीन से चार फीट है। इसके सामने आने के बाद प्रशासन ने पुरातत्व विभाग से इसकी जांच कराने का निर्णय लिया। सोमवार को सहायक अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। उन्होंने संरचना के भीतर उतरकर उसकी बनावट, दीवारों और निर्माण सामग्री का निरीक्षण किया।
प्रारंभिक निरीक्षण में संरचना को कूप जैसी बताया गया है। हालांकि पुरातत्व विभाग ने स्पष्ट किया कि सिर्फ दिखाई दे रही बनावट के आधार पर इसे निश्चित रूप से कुआं घोषित करना जल्दबाजी होगी। अधिकारी यह पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि इसका वास्तविक स्वरूप क्या था और इसका निर्माण किस उद्देश्य से किया गया था।
जांच के दौरान संरचना में लखौरी ईंटों का इस्तेमाल भी सामने आया। ये पतली और विशेष प्रकार की ईंटें पुराने दौर में निर्माण कार्यों में इस्तेमाल की जाती थीं। मौके पर मौजूद निर्माण सामग्री और बनावट को देखते हुए इसके करीब 200 से 250 साल पुराना होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि पुरातत्व विभाग ने अभी इसकी सही उम्र या निर्माण काल की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
डॉ. मनोज कुमार यादव के मुताबिक किसी भी पुरानी संरचना की उम्र और ऐतिहासिक महत्व निर्धारित करने के लिए निर्माण शैली, इस्तेमाल की गई सामग्री, संरचना की स्थिति और आसपास मिलने वाले अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों का अध्ययन जरूरी होता है। अभी तक ऐसा कोई शिलालेख, प्रतीक या अन्य स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे इसके निर्माण की निश्चित तारीख या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तय की जा सके।
संरचना के अंदर पानी का स्तर भी काफी नीचे बताया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल भी बना हुआ है कि इसका इस्तेमाल वास्तव में पानी के स्रोत के तौर पर होता था या किसी अन्य काम के लिए। कुएं जैसी बनावट के बावजूद विभाग इसी वजह से सावधानी बरत रहा है।
सहारनपुर के पुराने इतिहास को देखते हुए इस संरचना को लेकर स्थानीय स्तर पर भी चर्चाएं तेज हैं। हालांकि पुरातत्व विभाग ने इसे किसी विशेष शासक या ऐतिहासिक काल से जोड़ने से इनकार किया है। अधिकारियों का कहना है कि पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद ही इस बारे में कोई राय बनाई जा सकती है।
अब आगे की जांच प्रशासन और शासन के निर्णय पर निर्भर करेगी। यदि व्यवस्थित खुदाई की अनुमति मिलती है तो संरचना के आसपास के हिस्से की भी जांच की जा सकती है। इससे यह पता चल सकता है कि इसके आसपास किसी पुराने निर्माण के अवशेष मौजूद हैं या नहीं।
फिलहाल कलेक्ट्रेट परिसर में मिली यह संरचना कई सवाल छोड़ रही है। इसकी उम्र कितनी है, इसे किसने बनवाया था और इसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से होता था—इन सभी सवालों के जवाब विस्तृत पुरातात्विक जांच के बाद ही मिल सकेंगे। लखौरी ईंटों की मौजूदगी ने इसकी प्राचीनता को लेकर उत्सुकता जरूर बढ़ा दी है, लेकिन अंतिम तस्वीर जांच पूरी होने के बाद ही साफ होगी।

