लखनऊ : उत्तर प्रदेश में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के संभावित विलय को लेकर एक बार फिर सियासी और सामाजिक बहस तेज हो गई है। प्रदेश में फिलहाल शिया और सुन्नी समुदाय की वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए अलग-अलग बोर्ड काम कर रहे हैं। दोनों बोर्डों की अपनी अलग प्रशासनिक व्यवस्था, अध्यक्ष, सदस्य और समितियां हैं। ऐसे में यदि दोनों बोर्डों का विलय कर एक संयुक्त मुस्लिम वक्फ बोर्ड बनाया जाता है, तो इसका असर वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के साथ-साथ दोनों समुदायों की धार्मिक व्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है।
दोनों बोर्डों के विलय की मांग को लेकर शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष जितेंद्र सिंह सेंगर उर्फ वसीम रिजवी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल किए जाने की जानकारी सामने आई है। बताया जा रहा है कि उनकी पहली याचिका खारिज हो चुकी है, जिसके बाद उन्होंने दोबारा याचिका दाखिल की है। इसके अलावा इस मामले को लेकर अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में भी आवेदन दिए जाने की बात कही गई है। इस घटनाक्रम के बाद प्रदेश में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
विलय के समर्थन में क्या है तर्क?
वसीम रिजवी का दावा है कि उत्तर प्रदेश में शिया वक्फ संपत्तियों और उनसे होने वाली आय का हिस्सा कुल वक्फ संपत्तियों की आय के 15 प्रतिशत से कम है। उनका तर्क है कि वक्फ अधिनियम, 1995 के प्रावधानों के अनुसार किसी राज्य में अलग शिया वक्फ बोर्ड के गठन के लिए निर्धारित शर्तों का पूरा होना जरूरी है। उनका दावा है कि पूर्ववर्ती सरकारों के समय अलग शिया वक्फ बोर्ड का गठन किया गया, जो उनके अनुसार नियमों के अनुरूप नहीं था।
वसीम रिजवी का कहना है कि अलग-अलग बोर्ड होने की वजह से कुछ लोगों का एकाधिकार कायम रहता है और इससे वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग तथा अनियमितताओं की आशंका बढ़ती है। उनका मानना है कि दोनों बोर्डों को मिलाकर यदि एक संयुक्त मुस्लिम वक्फ बोर्ड बनाया जाता है तो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता लाई जा सकती है।
उनके मुताबिक, एक संयुक्त बोर्ड के जरिए वक्फ संपत्तियों की निगरानी और संरक्षण अधिक प्रभावी तरीके से किया जा सकता है। साथ ही संपत्तियों की बिक्री या उनके अनियमित इस्तेमाल पर भी रोक लगाने में मदद मिल सकती है।
शिया पक्ष ने विलय पर जताई आपत्ति
दूसरी ओर, ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के विलय की मांग पर कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि शिया और सुन्नी समुदाय की धार्मिक परंपराएं, रस्में और धार्मिक व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं। इसलिए दोनों समुदायों की वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन भी अलग-अलग बोर्डों के माध्यम से किया जाना चाहिए।
मौलाना यासूब अब्बास के अनुसार, शिया समुदाय के इमामबाड़ों, दरगाहों, मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों पर कई विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। इनमें मातम, नौहाख्वानी, ताजियादारी, 10 मोहर्रम का फातिहा, चेहलुम और 72 ताबूत जैसे आयोजन शामिल हैं। उनका कहना है कि इन धार्मिक परंपराओं की जानकारी और समझ रखने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के जरिए ही इन संपत्तियों और आयोजनों का बेहतर संचालन किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि मोहर्रम के दौरान करीब ढाई महीने तक शिया समुदाय में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इसके अलावा ईद-ए-गदीर सहित कई अन्य धार्मिक आयोजन भी होते हैं। ऐसे में दोनों बोर्डों के विलय के बाद प्रशासनिक स्तर पर कई तरह की व्यावहारिक दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।
कितनी हैं शिया और सुन्नी वक्फ संपत्तियां?
वक्फ संपत्तियों की संख्या को लेकर भी अलग-अलग आंकड़े सामने आ रहे हैं। वसीम रिजवी के अनुसार, सुन्नी वक्फ बोर्ड में करीब 1.32 लाख वक्फ संपत्तियां दर्ज हैं। वहीं, उनके कार्यकाल के दौरान शिया वक्फ बोर्ड में लगभग 3,800 संपत्तियां दर्ज थीं। अब यह संख्या करीब 6,000 से 7,000 के बीच बताई जा रही है। दूसरी ओर, उम्मीद पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार शिया वक्फ संपत्तियों की संख्या करीब 5,000 बताई गई है।
वसीम रिजवी ने वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 के तहत गठित होने वाले बोर्ड में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व का भी जिक्र किया। उनका कहना है कि शिया, सुन्नी, पसमांदा, महिलाओं और हिंदू समाज के प्रतिनिधियों को शामिल किए जाने से पारदर्शिता बढ़ सकती है और वक्फ संपत्तियों का बेहतर संरक्षण संभव हो सकता है।
फिलहाल शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के विलय का मुद्दा कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। एक पक्ष इसे वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन, पारदर्शिता और एकाधिकार खत्म करने की दिशा में कदम बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे शिया समुदाय की धार्मिक और प्रशासनिक स्वायत्तता के लिए नुकसानदेह मान रहा है। अब इस पूरे मामले में हाईकोर्ट की सुनवाई और सरकार के रुख पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

