किसान और पांखड : आज तक किसान और खास तौर पर जाट समुदाय खेतीबाड़ी में लगा रहता था, जो उनकी आर्थिकी और खाद्य आपूर्ति का मुख्य प्राकृतिक स्रोत है। आज जाट समुदाय के अधिकांश लोग खेतीबाड़ी छोड़ रहे हैं, जो घाटे का सौदा है! वे धार्मिक पाखंड और आडंबर में उलझते जा रहे हैं। इतना ही नहीं, आजकल जाट समुदाय के कुछ लोग धार्मिक पाखंड में गले तक डूब चुके हैं, यहां तक कि आडंबरी पंडित और पुजारी भी पीछे छूट गए हैं।

दरअसल, पाखंड में गले तक डूबने का मुख्य कारण यह है कि व्यापार और नौकरी में आने के बाद अधिकांश जाटों ने पंडितों द्वारा दिए गए मंत्र का पालन किया कि पाप करो और धार्मिक पाखंड से मुक्त हो जाओ। अन्य उच्च जातियों ने इसके प्रत्यक्ष और सफल दर्शन को आत्मसात कर लिया है। सत्ता के कोप से खुद को बचाना तथा तथाकथित स्वयंभू बाबाओं, साधुओं, संतों, कथावाचकों, शंकराचार्यों, मठाधीशों तथा सत्ता के दरबारों में आर्थिक व धार्मिक आडम्बर करके अपनी सामाजिक व राजनीतिक स्थिति को बढ़ता हुआ देखना उनके लिए आकर्षक हो गया है। इसलिए व्यापार व नौकरी करने वाले अधिकांश जाटों ने इस धार्मिक हथकंडे को अपनाकर अपार धन-संपत्ति अर्जित करना शुरू कर दिया है। वे सांसद, विधायक, पार्षद व मंत्री आदि बनने के लिए अधिकाधिक धार्मिक व सामाजिक आडम्बर करने लगे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता व विचारक जितेन्द्र सिंह सहरावत कहते हैं कि सफल व शक्तिशाली जाटों के आडम्बर व पाखंड को देखकर आम जाट भी उनके बताए रास्ते पर चलने के सपने को पूरा करने के लिए धार्मिक पाखंड व आडम्बर करने लगे हैं तथा इन सफल व शक्तिशाली जाटों व अन्य धनी गणमान्य व्यक्तियों की चमचागिरी करने लगे हैं। अर्थात हमारे शिक्षित, सफल व शक्तिशाली जाटों ने दैनिक विवेक, स्वाभिमान, आत्मसम्मान व नैतिक बल की मूल शक्ति को मारकर यह सब हासिल किया है। धार्मिक शक्तियों के नाम पर किए जाने वाले पाखंड और आडंबरों से उन्होंने यह हासिल नहीं किया है।

उन्होंने अपने समाज को यह सच्चाई नहीं बताई। यदि बताई होती तो उनके दरबारी आम जाट नहीं बनते। बल्कि उन्होंने अपने रुतबे और दरबार को सजाने और बढ़ाने के लिए धार्मिक शक्तियों के पाखंड और आडंबर को हमारी चमक, रौनक और रुतबे को बढ़ाने का श्रेय देकर समाज को गुमराह किया है और समाज को इस अंधकार में धकेलकर उन्होंने धार्मिक सामग्री खरीदवाकर ब्राह्मणों और व्यापारियों के धंधे को ही मजबूत किया है और अभी भी कर रहे हैं। वैसे भी, फोकस जाट समाज की तरक्की और उनके राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण पर है। यह समाज की एकता और सहयोग के महत्व को रेखांकित करता है, खासकर तब जब वे उच्च शिक्षित हों और विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित हों। किसी भी समाज के विकास के लिए शिक्षा और जागरूकता जरूरी है।
जाट समुदाय के लोगों को उच्च शिक्षा हासिल करने और अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने की जरूरत है। समुदाय के हितों की रक्षा और उनके विकास के लिए राजनीतिक भागीदारी जरूरी है। समुदाय के लोगों को राजनीतिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए और अपने प्रतिनिधियों का चयन करना चाहिए जो उनके हितों की रक्षा कर सकें। समाज के विकास के लिए आर्थिक सशक्तिकरण जरूरी है। जाट समाज के लोगों को अपने व्यापार व उद्योग को बढ़ावा देने के लिए काम करना चाहिए तथा आर्थिक रूप से मजबूत बनना चाहिए। समाज के विकास के लिए सामाजिक एकता व सहयोग जरूरी है। लोगों को एकजुट होकर अपने समाज के हितों की रक्षा करनी चाहिए तथा एक दूसरे का सहयोग करना चाहिए।
इन सभी बिंदुओं पर ध्यान देकर एक मजबूत व समृद्ध समाज का निर्माण किया जा सकता है। जिस दिन जाट समाज के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले उच्च शिक्षित सदस्य तथा उच्च सेवाओं व व्यापार आदि में स्थापित लोग एक विवेकशील व तार्किक समाज का निर्माण करने तथा अपने सहयोगी जातियों को एकजुट कर लोकतंत्र के मंदिर में राजनीतिक निर्णय लेने का कार्य अपने हाथ में ले लेंगे, जो समाज को आर्थिक व सामाजिक रूप से मजबूत करने वाली मूल शक्ति है, उसी समय से जाट जाति आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से मजबूत होना शुरू हो जाएगी।