जहाँ तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद पद छोड़ने के बयान का सवाल है, अब यह भी एक मुहावरा सा लगता है। मोदी के नेतृत्व में सत्ता के केंद्रीकरण की जो प्रवृत्ति विकसित हुई है, वह ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ की सोच को धीरे-धीरे खोखला कर रही है। संघ के भीतर का ‘मौन विरोध’ अब मुखर होने की ओर अग्रसर है। क्योंकि यह मुद्दा अब ‘राजनीतिक सुविधा’ से ज़्यादा संघ की रीढ़ पर भारी पड़ रहा है।
दरअसल, इस समय संघ के लिए खुद को नए सिरे से परिभाषित करना ज़रूरी है, न सिर्फ़ अपनी शाखाओं की संख्या बढ़ाने के लिए, बल्कि यह भी तय करने के लिए कि उसके स्वयंसेवक किस विचारधारा को लेकर चल रहे हैं और कहीं वे किसी राजनीति का औज़ार तो नहीं बन रहे? संघ के लिए यह आत्ममंथन का समय है, क्योंकि अगर संघ को अपने शताब्दी वर्ष को सार्थक बनाना है, तो उसे नेतृत्व के स्तर पर एक कठोर फ़ैसला लेना होगा और समझना होगा कि क्या वह एक सांस्कृतिक संगठन बना रहना चाहता है या पूरी तरह से सत्ता की राजनीति के आगे समर्पण कर चुका है?
ख़ैर, इसलिए संघ की विचारधारा को फिर से केंद्र में लाना होगा और सत्ता के विस्तार को संतुलित करना होगा। अन्यथा, यह शताब्दी वर्ष इतिहास में ‘गौरव के सौ वर्ष’ की बजाय ‘संघ के लिए संकट का वर्ष’ बनकर रह जाएगा और अगर संघ प्रमुख मोहन भागवत इस दिशा में स्पष्ट नेतृत्व नहीं दे पाए, तो इतिहास उन्हें एक निर्णायक मोड़ पर कमज़ोर साबित हुए नेतृत्व के रूप में याद रखेगा। RSS News