देवबंद : जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि असम मुसलमानों के विनाश का मामला है। वहाँ के मुख्यमंत्री, चाहे दिल्ली हो या असम, शेष भारत से सरकार को अलग करना चाहते थे। सबने मिलकर तय किया कि बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच युद्ध के बाद, जब यहाँ-वहाँ स्थिरता थी। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नीति के अनुसार, पाकिस्तान का विभाजन हुआ। इसलिए हमने साथ बैठकर तय किया कि पूरे भारत में भारतीय होने की नींव 1951 की होगी।
लेकिन असम में असमिया होने की नींव 1971 की होगी। बांग्लादेश बना और पाकिस्तान को नुकसान पहुँचा। पाकिस्तान का विभाजन हुआ। मुख्यमंत्री जी, यह उस परिवार और घराने का कर्तव्य है, जिसने हमेशा कांग्रेस की रोटी तोड़ी है। लेकिन मन और मस्तिष्क आरएसएस का था। हमने सोनिया गांधी जी से कहा था कि उन्हें टिकट न दें। मैंने उन्हें पत्र भेजा था। लेकिन वह नहीं मानीं। अब आज वही हेमंतो हैं जिन्होंने कांग्रेस की उस नीति और रीति के खिलाफ असम में अलख जगाई है। यह सरकार की नीति है और हम सरकार से लड़ते हैं।
दूसरी ओर, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने गुरुवार को नई दिल्ली में अपनी आम सभा के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की तारीफ़ की। संघ के शताब्दी वर्ष पर हाल ही में पारित समिति के प्रस्ताव का ज़िक्र करते हुए मदनी ने कहा, “अगर हिंदू-मुस्लिम एकता की बात है, तो हम आरएसएस के ख़िलाफ़ नहीं हैं।” मदनी ने खुलासा किया कि उन्होंने लगभग आठ साल पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की थी और उन्हें भी यही संदेश दिया था। उन्होंने आगे कहा, “हालांकि ऐसा मौका बाद में नहीं आया, लेकिन अगर फिर आया तो हम मिलेंगे।”
डॉ. मोहन भागवत ने तीन बच्चे पैदा करने की बात कही। इस पर मदनी ने कहा कि “हर कोई अपनी इच्छा से फ़ैसला लेने के लिए स्वतंत्र है।” साथ ही, मस्जिदों में शिवलिंग मिलने के विवाद पर उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जमीयत 1991 के उपासना अधिनियम का सम्मान करती है। Deoband News