दिल्ली : विधानसभा चुनाव से पहले बिहार में राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। विपक्ष ने राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के स्वास्थ्य और उनके प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर तीखे सवाल उठाए हैं। यह कोई साधारण बहस नहीं, बल्कि एक गंभीर राजनीतिक विमर्श है जो सिर्फ़ नीतीश कुमार के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे बिहार के शासन की दिशा और दशा पर सवाल उठाता है। सवाल यह है कि क्या विपक्ष द्वारा नीतीश कुमार पर सवाल उठाना और उनके नेतृत्व पर संदेह करना महज़ एक अफवाह है या इसमें सच्चाई के संकेत हैं?
73 वर्षीय नीतीश कुमार लंबे समय से केंद्र और राज्य सरकार में मौजूद हैं और वे एक अनुभवी नेता हैं। लेकिन हाल के महीनों में उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों की संख्या में कमी, बयानों में अस्पष्टता और कभी-कभार शारीरिक अस्वस्थता के संकेतों ने उनकी सक्रियता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष पूछ रहा है कि क्या नीतीश कुमार अब भी वही ‘सक्षम और सजग मुख्यमंत्री’ हैं, जिनके फैसलों पर कभी पूरा बिहार निर्भर रहता था? विपक्षी दलों, खासकर राजद और कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि सरकार में “नेतृत्व शून्यता” पैदा हो गई है और पर्दे के पीछे से कोई और फैसले ले रहा है।
“मुख्यमंत्री कौन है?” और “क्या सरकार रिमोट कंट्रोल से चल रही है?” जैसे सवाल सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया चैनलों पर गूंज रहे हैं। विपक्ष के सवालों पर सत्ताधारी दल की चुप्पी को क्या कोई रणनीति या भ्रम माना जाए? क्योंकि जिस तरह से सत्तारूढ़ गठबंधन, खासकर जदयू और भाजपा, इन सवालों पर खामोश नजर आ रहे हैं, वह भी सोचने पर मजबूर करता है। क्या यह चुप्पी ध्यान भटकाने की रणनीतिक कोशिश है? या यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि सब कुछ सामान्य नहीं है? अगर नीतीश कुमार वाकई शारीरिक या मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, तो जनता को जानकारी पाने का अधिकार है।
लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही शासन के मूल स्तंभ हैं। अगर राज्य ऐसी स्थिति में पहुँच गया है जहाँ मुख्यमंत्री की सक्रियता सीमित हो गई है, तो एक स्पष्ट स्थिति सामने आनी चाहिए, चाहे वह कार्यभार किसी और को सौंपना हो या नेतृत्व स्तर पर संरचनात्मक बदलाव लाना हो। अब, असमंजस और अस्थिरता के इस मौजूदा माहौल में, विपक्ष को सबसे ज़्यादा फ़ायदा होता दिख रहा है। वे “पुराने नेताओं को आराम चाहिए”, “जनता को नई ऊर्जा चाहिए”, “युवाओं को नेतृत्व में भागीदारी चाहिए” जैसे नारों के ज़रिए जनभावनाओं को भुनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर, अगर सत्तारूढ़ गठबंधन समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं करता है, तो उसे राजनीतिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। गठबंधन में अंदरूनी कलह की संभावनाएँ भी बढ़ सकती हैं – खासकर भाजपा और जदयू के बीच, जो पहले भी कई मुद्दों पर आपस में भिड़ चुके हैं। अगर यही स्थिति रही, तो विपक्ष यह नैरेटिव सेट करने में कामयाब हो सकता है कि यह सरकार “मुख्यमंत्री-विहीन” है।
हालांकि, इस समय बिहार की जनता की नज़रों में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी की गिरती साख भी चुनावों में अहम भूमिका निभाने वाली है। इसके अलावा, सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस राजनीतिक रस्साकशी का असर बिहार के आम लोगों पर पड़ रहा है। बिहार की जनता पहले से ही बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और विकास की धीमी गति से जूझ रही है। अब जब उनका नेतृत्व से विश्वास उठ गया है, तो लोकतंत्र से भी उनका विश्वास डगमगाने लगा है। ऐसे में, “बिहार सरकार कौन चला रहा है?”
इस सवाल का जवाब देना ज़रूरी हो जाता है क्योंकि यह सवाल अब सिर्फ़ चुनावी भाषणों का हिस्सा नहीं रहा। बल्कि, यह एक वास्तविक और संवैधानिक मुद्दा बन गया है। अगर नीतीश कुमार अभी भी पूरी तरह सक्षम हैं, तो उन्हें आगे आकर स्पष्ट स्पष्टीकरण देना चाहिए, और अगर नहीं? तो राज्य हित में तुरंत कोई निर्णायक कदम उठाना ज़रूरी है। दरअसल, राजनीति में नेतृत्व सिर्फ़ कुर्सी पर बैठने से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और पारदर्शिता से बनता है। बिहार सरकार को अब विश्वास की इस परीक्षा में पास होना ही होगा, वरना अगले चुनाव में जनता इसका जवाब देगी।