Saharanpur News : दिव्यांग दंपत्ति ने तीन बच्चों के साथ खाया था जहर, देर शाम मां-बेटे की हो गई मौत, वजह जान हर कोई हैरान

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सहारनपुर : उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में सोमवार को दिव्यांग दंपत्ति देहरादून हाईवे पर हरोड़ा गांव के पास तीन बच्चों के साथ जहरीला पदार्थ खा लिया। जिससे सबकी तबियत बिगड़ने पर राहगीरों ने अस्पताल में भर्ती कराया था। जहां इलाज के दौरान देर शाम डेढ़ साल के मासूम बच्चे की मौत हो गई। वहीं देर रात दिव्यांग पत्नी ने भी दम तोड़ दिया। मां-बेटे की मौत से परिजनों में कोहराम मचा हुआ है जबकि पति और दोनों बेटियों की हालत नाजुक बनी हुई है। तीनों का निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। मौके पर पहुंचे भीम आर्मी कार्यकर्ताओं ने जिला अस्पताल में समय पर इलाज नहीं करने का आरोप लगाया है। बताया जा रहा है कि कर्ज से तंग आकर विकास ने यह आत्मघाती कदम उठाया है।

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आपको बता दें कि थाना देहात कोतवाली इलाके के नंदी फिरोजपुर गांव निवासी विकास ने सोमवार दोपहर हरोड़ा गांव के पास अपने तीन बच्चों परी, पलक, विवेक और पत्नी रजनी के साथ जहर का सेवन कर लिया था। जिससे उनकी हालत बिगड़ गई। मासूम विवेक की सोमवार शाम को इलाज के दौरान मौत हो गई। जबकि देर रात पत्नी रजनी ने भी दम तोड़ दिया। जबकि पति विकास की हालत गंभीर बनी हुई है और दोनों बेटियों की हालत स्थिर बताई जा रही है।

मंगलवार सुबह भीम आर्मी के राष्ट्रीय महासचिव कमल वालिया भी कार्यकर्ताओं के साथ निजी अस्पताल पहुंचे। जहां कमल वालिया ने आरोप लगाया कि जिला अस्पताल में लापरवाही के चलते सोमवार शाम डेढ़ वर्षीय विवेक की मौत हो गई। वहां से उन्हें समय पर एंबुलेंस उपलब्ध नहीं कराई गई। उन्होंने अनावश्यक दबाव बनाने वाली फाइनेंस कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की है। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंच गई। पुलिस ने महिला के शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। हालांकि डेढ़ साल के बच्चे के शव को बिना पोस्टमार्टम के ही देर रात दफना दिया गया।

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वहीं इस दौरान जिला अस्पताल में तीन मासूम बच्चों और जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे दंपती के साथ जो हुआ। वह मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाला था। पहले तो ट्रॉमा सेंटर के अंदर मौजूद डॉक्टर सिर्फ प्राथमिक उपचार तक ही सीमित रहे। हद तो तब हो गई, जब उन्हें रेफर करने के लिए 108 एंबुलेंस में लिटाया गया और दोनों एंबुलेंस के चालकों के पास लखनऊ से आई आईडी नहीं आई। जिससे वे 20 मिनट तक वहीं खड़े रहे और तीनों मासूम बच्चे और दंपती अंदर ही तड़पते रहे।

परिजनों के मुताबिक़ दोपहर करीब डेढ़ बजे पांचों पीड़ितों को जिला अस्पताल लाया गया। उन्हें ट्रॉमा सेंटर में चार बेड पर लिटाकर प्राथमिक उपचार शुरू किया गया। पूरा परिवार पीड़ा से तड़पता रहा, लेकिन उन्हें आईसीसीयू में भर्ती करना उचित नहीं समझा गया। वहां मौजूद डॉक्टर रेफर करने की बात कहते रहे। इसके बाद रेफर करने की कागजी कार्रवाई शुरू हुई, जो करीब आधे घंटे तक चली। कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद दो 108 एंबुलेंस बुलाई गईं। एक एंबुलेंस में विकास और बेटी को लिटाया गया, जबकि दूसरी एंबुलेंस में रजनी और दोनों छोटे बच्चों को लिटाया गया।

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हैरत की बात तो ये है कि बच्चों वाली एंबुलेंस 20 मिनट बाद रवाना हुई ड्राइवरों ने कहा कि लखनऊ से आईडी मिलने के बाद ही जाएंगे। वे बार-बार लखनऊ फोन करके आईडी मांगते रहे। इस प्रक्रिया में करीब 20 मिनट लग गए। 20 मिनट बाद बच्चों वाली एंबुलेंस रवाना हुई। जिस एंबुलेंस में दंपती थे, वह महज 10 मीटर दूर जाकर फिर रुक गई। तीमारदारों को बताया गया कि आईडी में कुछ दिक्कत है। करीब पांच मिनट तक वहीं खड़ी रही और फिर मेडिकल के लिए रवाना हो गई। इस दौरान परिजन और वहां मौजूद सभी लोग यही कहते नजर आए कि पांच लोगों की जिंदगी का सवाल है, जल्दी ले जाओ।

दरसअल एंबुलेंस रवाना करने से पहले लखनऊ से आईडी पासवर्ड मिलता है। इसमें कॉल करने वाले का विवरण होता है। आईडी में वाहन और मोबाइल नंबर दर्ज होता है। क्योंकि हर एंबुलेंस में जीपीएस सिस्टम होता है। लखनऊ से हरी झंडी मिलने के बाद एंबुलेंस रवाना होती है। अन्य मरीज डरे, मची चीख पुकार ट्रॉमा सेंटर में पांचों की चीख पुकार सुनकर अन्य बेड पर भर्ती मरीज भी डरे नजर आए। छजपुरा गांव की महिला सुमन भी वहां भर्ती थी। उसके बगल वाले बेड पर एक तरफ विकास और दूसरी तरफ विकास की पत्नी रजनी थी। दोनों को बार-बार उल्टी हो रही थी। इसी तरह दूसरे बेड पर भर्ती एक मरीज पूरे सवा घंटे तक कंबल से मुंह ढके लेटा रहा। किसी ने अन्य मरीजों को किनारे करने की जरूरत नहीं समझी। इतनी चीखें सुनकर उन पर क्या गुजर रही होगी, वे भी तो मरीज थे।

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ट्रॉमा सेंटर में करीब सवा घंटा बीता कि कुछ देर के लिए विकास, रजनी, दोनों बेटियां परी और पलक भी चुप हो गईं। लेकिन सबसे छोटा डेढ़ साल का मासूम विवेक दर्द के मारे तड़पता रहा। वह बार-बार पेट पर हाथ मार रहा था। मासूम को इस हालत में देख वहां मौजूद हर कोई यही कह रहा था कि उसका क्या कसूर था। बच्चों का क्या कसूर था कि उन्होंने उन्हें इस हालत में पहुंचा दिया। विकास ने यह गलत किया।

जिला अस्पताल में भर्ती विकास की हालत सबसे ज्यादा खराब थी। जब उससे पूछा गया कि वह कहां जा रहा था और यह सब क्यों किया तो उसने लड़खड़ाते शब्दों में कहा कि हम मरने निकले थे। जिंदा रहकर भी क्या कर सकते हैं। कर्ज के दबाव ने हमें बर्बाद कर दिया है। बस बच्चों को बचा लो। रजनी भी बार-बार यही कह रही थी कि मेरे बच्चों को बचा लो। जब उससे पूछा गया कि उसने जहर क्यों खाया तो उसने कहा कि वह क्या कर सकती थी, हम तंग आ गए थे।

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